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बेनामी संव्यवहार (प्रतिषेध ) संशोधन अधिनियम २०१६ और सर्वोच्च न्यायालय|

मित्रों बेनामी सम्पत्ति के बारे में आपने अक्सर ही सुना होगा, पर क्या आपने सही अर्थो में इसे किसी को समझाने का प्रयास किया है की बेनामी सम्पत्ति किसे कहते हैं और ये कैसे प्राप्त की जाती है |  बेनामी सम्पत्ति के मूल में होता है अवैध रूप से अर्जित किया गया धन, जैसे मित्रों कई बार ऐसा देखा गया है की सरकारी विभागों में कार्य करने वाले ऐसे कई क्लर्को के पास करोडो की चल और अचल सम्पत्ति (जो उन्होंने  अपने दोस्तों और रिस्तेदारो के नाम पर खरीद कर रखा होता है ) और जब वो जाँच के दायरे में आते हैं तब पता चलता है कि रिश्वत या  सुविधा शुल्क के रूप में प्राप्त की गई अवैध कमाई के जरिये ही उन सम्पत्तियो को ख़रीदा गया  है| 

‘बेनामी लेन-देन’ शब्द का आम तौर पर अर्थ है कि कोई व्यक्ति किसी और के नाम पर संपत्ति खरीदता है, यानी एक नाम ऋणदाता, और खरीदार संपत्ति में लाभकारी हित नहीं रखता है। शाब्दिक रूप से, ‘बेनामी’ का अर्थ है ‘बिना नाम’।

‘बेनामी’ शब्द, जो औपनिवेशिक शासन के दौरान और गणतंत्र के शुरुआती दिनों में वैधानिक कानून से अलग था और केवल वकीलों की कानूनी भाषा में जाना जाता था। यहां तक कि मुस्लिम कानून में भी, इस तरह के लेन-देन को आमतौर पर फरजी लेन – देन  के रूप में संदर्भित किया जाता था, जो अरबी शब्द फ़राज़ से लिया गया था। समय बीतने के साथ, यह अस्पष्ट अवधारणा अपने मूल रूपों के संबंध में बिना स्पष्टता के कई  मामलों में प्रकट हुई। अवधारणात्मक रूप से, दो विचार हैं जो बेनामी के सिद्धांत से उत्पन्न होते हैं। पहला विचार यह है कि बेनामीदार संपत्ति पर स्वामित्व नहीं रखता है, और दूसरा विचार यह है कि हालांकि हक बेनामीदार को हस्तांतरित होता है, पर वह इसे भरोसे (ट्रस्ट) में रखता है।

आखिरकार, लेन-देन की दो ढीली श्रेणियां विकसित हुईं जिन्हें बोलचाल की भाषा में बेनामी कहा गया, जिसे निम्नलिखित उदाहरणों के माध्यम से समझाया जा सकता है: McNaughton’s Selected Report Vol. I, Reporter’s Note at p. 368.

    (i)         त्रिपक्षीय : ‘ब ’ एक अचल सम्पत्ति  ‘अ ’ (वास्तविक  स्वामी ) को बेचता है , लेकिन विक्रय करार (सेल डीड) में “स” का नाम  स्वामी /बेनामिदार के रूप में उद्धृत किया जाता है |

    (ii)        द्विपक्षीय  : ‘अ ’ अपने संपत्ति  ‘ब ’ को बेचता है, जबकि उसका  आशय उस संपत्ति के हक का हस्तांतरण “ब” के पक्ष में करने का नहीं है | 

श्री मीनाक्षी मिल्स लिमिटेड बनाम आयकर आयुक्त, मद्रास, एआईआर 1957 एससी 49, मामले में आदेश पारित करते हुए, जस्टिस श्री वेंकटराम अय्यर,  ने कहा कि लेनदेन की पहली श्रेणी को ‘आमतौर पर’ बेनामी कहा जाता है, जबकि दूसरी श्रेणी ‘कभी-कभी’ एक बेनामी लेनदेन माना जाता है, परन्तु  यह “शायद सटीक रूप से इतना उपयोग नहीं किया गया है”।

जबकि ठाकुर भीम सिंह बनाम ठाकुर कान सिंह, एआईआर १९८0 एससी ७२७, मामले में आदेश पारित करते हुए, जस्टिस श्री वेंकटराम अय्यर,ने सीधे पहली श्रेणी को बेनामी कहा, लेकिन दूसरी श्रेणी को वर्णित करने के लिए “ढीला”  शब्द को चूना।

मित्रों हमारे देश भारत में इस तरह बेनामी सम्पत्ति के संव्यवहार या लेन देन  के प्रसार के लिए कई कारण, कुछ वांछनीय और कुछ अवांछनीय, दृष्टिगत होते हैं । उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

(i) हिंदू संयुक्त परिवार प्रणाली के भीतर परिवारों के लिए गुप्त प्रावधान;

(ii) राजनीतिक और सामाजिक जोखिम का शमन;

(iii) लेनदारों को धोखा देना;

(iv) करों की चोरी।

जयदयाल पोद्दार बनाम बीबी हाजरा, एआईआर १९७४ एससी १७१ में, सर्वोच्च  न्यायालय ने कोई लेनदेन बेनामी है या नहीं, यह निर्धारित करने के लिए एक परीक्षण निर्धारित जिसके अंतर्गत निम्नलिखित कारकों पर विचार किया जाना था:-

(i) वह स्रोत जिससे संपत्ति को क्रय करने का पैसा आया था |

(ii) क्रय करने के पश्चात  संपत्ति की प्रकृति और कब्जा |

(iii) लेनदेन को बेनामी रंग देने के लिए मकसद, यदि कोई हो |

(iv) दावेदार और कथित बेनामीदार के बीच पार्टियों की स्थिति और संबंध, यदि कोई हो।

(v) बिक्री के बाद टाइटल डीड्स (अधिकार, हक़ और हित से सम्बंधित दस्तावेज)  की अभिरक्षा, और

(vi) बिक्री के बाद संपत्ति से निपटने में संबंधित पक्षों का आचरण।

विधि आयोग (१९७३ ) की ५७ वीं रिपोर्ट में बेनामी व्यवहार या लेन देन के  प्रचलित सामान्य सिद्धांतों को संक्षेप में निम्नलिखित तरीके से प्रस्तुत किया गया है:

“५ .२  सामान्य तौर पर वर्तमान स्थिति का सारांश बेनामी लेनदेन से संबंधित कुछ बुनियादी बिंदुओं को निम्नानुसार बताया जा सकता है:

(ए) बेनामी हस्तांतरण या लेन-देन का अर्थ है किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा या उस व्यक्ति को  स्थानांतरण जो वास्तविक मालिक के स्थान पर केवल प्रत्यक्ष स्वामी के रूप में कार्य करता है जिसका नाम प्रकट नहीं किया गया है;

(बी) यह सवाल कि क्या ऐसा हस्तांतरण या लेनदेन वास्तविक था या बेनामी लाभार्थी के इरादे पर निर्भर करता है;

(सी) ऐसे मामलों में वास्तविक मालिक को लाभार्थी और प्रत्यक्ष मालिक को बेनामीदार कहा जा सकता है।

… ५ .३ । बेनामी हस्तांतरण का प्रभाव इस प्रकार है:-

(ए) एक व्यक्ति केवल अपने नाम के कारण उस संपत्ति में कोई हित (Interest)  नहीं रखता;

(बी) बेनामीदार का कोई लाभकारी हित नहीं है, हालांकि वह तीसरे व्यक्ति के रूप में कानूनी मालिक का प्रतिनिधित्व कर सकता है।

(सी) कुछ निर्दिष्ट स्थितियों को छोड़कर, एक बेनामी लेनदेन कानूनी है।

बेनामी लेनदेन को किसी भी लेनदेन के रूप में परिभाषित करती है जिसमें संपत्ति एक व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भुगतान या प्रदान किए गए प्रतिफल के लिए स्थानांतरित की जाती है। कानून ने केवल त्रिपक्षीय बेनामी लेनदेन को शामिल करने के लिए चुना, जबकि द्विदलीय/शिथिल रूप से बेनामी लेनदेन के रूप में वर्णित, परिभाषा से बाहर रखा गया था।

अब यंहा पर ध्यान देने वाली तीन  बाते हैं :- 

१:- सम्पत्ति किसी और के नाम पर खरीदी जाती है;

२:- सम्पत्ति की कीमत कोई और अदा करता है  और 

३:- सम्पत्ति की कीमत अदा करने के लिए जिस धन का उपयोग होता है वो अवैध रूप से अर्जित गैरजाहिर धन होता है |

इसी अवैध या गैरजाहिर धन को काला धन के नाम से भी जाना जाता है | भारत में बढ़ते काले धन की समस्या से संगठनात्मक और वैधनात्मक रूप से मुक्ति पाने के लिए आदरणीय नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने नवम्बर २०१६  में “नोटबंदी” योजना पर अमल करते हुए  ५०० और १००० रुपये के नोट को अवैध घोषित कर  दिया था। जिसके परिणामस्वरूप कई अवैध खातों , कई अवैध कंपनियों और कई अवैध संगठनों का अस्तित्व समाप्त हो गया | राजैनितक संगठन तो खून के आंसू पिने के लिए बाध्य हो गए | पर मित्रों मोदी सरकार यहीं नहीं रुकी और  इसी दिशा में सरकार ने एक कदम और आगे बढ़कर बेनामी संपत्ति कानून, १९८८  में आवश्यक संशोधन वर्ष २०१६ में कर डाला। यह संशोधित कानून १  नवम्बर, २०१६  से लागू हो गया। 

आपको बताते चले की केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बेनामी लेन-देन (निषेध) संशोधन विधेयक को २० जुलाई, २०१६  को मंजूरी प्रदान की थी और लोक सभा द्वारा इस विधेयक को २७  जुलाई, २०१६  तथा राज्य सभा द्वारा २  अगस्त, २०१६  को पारित किया गया। इसका उद्देश्य पहले से मौजूद बेनामी लेन-देन (निषेध) विधेयक, १९८८  में संशोधन करना था । वैसे वर्ष १९८८  में बनाए गए कानून का उद्देश्य भी करवंचना और संपत्तियों के अनियमित एवं बेजा उपयोग को रोकना ही था किंतु इस विधेयक के प्रावधानों में कई तरह की व्यावहारिक कठिनाइयां थीं जो प्रस्तावित संशोधन के अधिनियम के रूप में परिवर्तित होने के बाद खत्म हो गयी । इस संशोधित विधि के अंतर्गत ही बेनामी संपत्‍तियों को जब्त करने और उन्हें सील करने का अधिकार दिया गया है। 

इस संशोधन के बाद अब उस संपत्ति को भी बेनामी माना जायेगा जो कि किसी फर्जी नाम से खरीदी गयी है। अगर संपत्ति के मालिक को ही पता नहीं हो कि संपत्ति का असली मालिक कौन है तो फिर ऐसी संपत्ति को भी बेनामी संपत्ति माना जायेगा।

चलिए देखते हैं कि “बेनामी संपत्ति” की परिभाषा क्या है ? 

बेनामी संव्यवहार  (प्रतिषेध ) संशोधन अधिनियम २०१६  की धारा २ (८) के अनुसार बेनामी सम्पत्ति से कोई ऐसी सम्पत्ति अभिप्रेत है, जो किसी बेनामी संव्यवहार की विषय वस्तु है और इसके अंतर्गत ऐसी संपत्ति के आगम भी हैं | अब सीधे और स्पष्ट शब्दों में यदि कहे तो जो संपत्ति बेनामी संव्यवहार की विषय वस्तु होती है , वो बेनामी संपत्ति कहलाती है |  

आइये देखते हैं की बेनामी संव्यवहार क्या होता है ? 

 बेनामी संव्यवहार  (प्रतिषेध ) संशोधन अधिनियम २०१६  की धारा २ (९ ) के अनुसार:- बेनामी संव्यवहार से

(अ ) कोई ऐसा संव्यवहार या ठहराव अभिप्रेत है :-

(क) जंहा किसी व्यक्ति को संपत्ति का अंतरण किया जाता है या वह उसके द्वारा धारित की जाती है और उस संपत्ति के लिए प्रतिफल किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उपलब्ध कराया जाता है ; और

(ख) जंहा संपत्ति को, उस व्यक्ति के, जो प्रतिफल उलब्ध कराता है, तुरंत या भावी, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, फायदे के लिए धारण किया जाता है,

(आ) किसी संपत्ति के सम्बन्ध में किसी कल्पित नाम से किया गया कोई संव्यवहार या ठहराव अभिप्रेत है; या

(इ) किसी सम्पत्ति के सम्बन्ध में, जंहा संपत्ति के स्वामी को ऐसे स्वामित्व के बारे में कोई जानकारी नहीं है या वह ऐसे स्वामित्व की जानकारी  होने से इंकार करता है, ऐसा संव्यवहार या ठहराव अभिप्रेत है; या

(ई ) ऐसी सम्पत्ति के सम्बन्ध में, जंहा प्रतिफल उलब्ध कराने वाले व्यक्ति का पता नहीं लग सकता है या वह कल्पित व्यक्ति है, कोई  संव्यवहार या ठहराव अभिप्रेत है| 

धारा 3. बेनामी लेनदेन का निषेध (१) कोई भी व्यक्ति किसी बेनामी लेनदेन में प्रवेश नहीं करेगा।

(२) उपधारा (१) की कोई बात किसी व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी या अविवाहित पुत्री के नाम पर संपत्ति की खरीद पर लागू नहीं होगी और यह माना जाएगा, जब तक कि इसके विपरीत साबित नहीं किया जाता है कि उक्त संपत्ति लाभ के लिए खरीदी गई थी अविवाहित पुत्री की पत्नी से।

(३) जो कोई भी किसी बेनामी लेनदेन में प्रवेश करता है, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक हो सकती है, या जुर्माना या दोनों से दंडनीय होगा।

(४) दंड प्रक्रिया संहिता, १९७३ (१९७४ का २) में किसी बात के होते हुए भी, इस धारा के तहत एक अपराध असंज्ञेय और जमानती होगा।

अगर किसी ने अपने बच्चों या पत्नी के नाम संपत्ति खरीदी है लेकिन उसे अपने आयकर रिटर्न में नहीं दिखाया तो उसे बेनामी संपत्ति माना जायेगा। अगर सरकार को किसी सम्पत्ति पर अंदेशा होता है तो वो उस संपत्ति के मालिक से पूछताछ कर सकती है और उसे नोटिस भेजकर उससे उस प्रॉपर्टी के सभी कागजात मांग सकती है जिसे मालिक को ९०  दिनों के अंदर दिखाना होगा। अगर जाँच में कुछ गड़बड़ी पायी गई तो उस पर कड़ी कार्यवाही हो सकती है।

इस नए कानून के अन्तर्गत बेनामी लेनदेन करने वाले को ३  से ७ साल की जेल और उस प्रॉपर्टी की बाजार कीमत पर २५ % जुर्माने का प्रावधान है। अगर कोई बेनामी संपत्ति की गलत सूचना देता है तो उस पर प्रॉपर्टी के बाजार मूल्य का १० % तक जुर्माना और ६  महीने से ५  साल तक की जेल का प्रावधान रखा गया है। इनके अलावा अगर कोई ये सिद्ध नहीं कर पाया की ये सम्पत्ति उसकी है तो सरकार द्वारा वह सम्पत्ति जब्त भी की जा सकती है।

बेनामी सम्पत्ति के बारे में प्रमुख बातें स्पष्ट हैं- 

पहला, जब संपत्ति खरीदने वाला अपने पैसे से किसी और के नाम पर सम्पत्ति खरीदता है तो यह बेनामी सम्पत्ति कहलाती है। लेकिन शर्त ये है कि खरीद में लगा पैसे आमदनी के अज्ञात स्रोतों से होना चाहिए।

दूसरा, अगर क्रेता ने इसे परिवार के किसी व्यक्ति या किसी करीबी के नाम पर भी खरीदा हो तब भी ये बेनामी सम्पत्ति ही कही जाएगी। (स्पष्ट शब्दों में कहें तो बेनामी संपत्ति खरीदने वाला व्यक्ति कानून मिलकियत अपने नाम नहीं रखता, लेकिन सम्पत्ति पर कब्ज़ा रखता है।) 

तीसरा, १९८८ के काननू में किया गया संशोधन १  नवंबर २०१६  से लागू हो गया है। इसके तहत केंद्र सरकार के पास ऐसी सम्पत्ति को जब्त करने का भी अधिकार है। 

चतुर्थ, बेनामी संपत्ति की लेनदेन के लिए दोषी पाए गए व्यक्ति को सात साल तक के कैद की सजा हो सकती है और सम्पत्ति के बाजार मूल्य के एक चौथाई के बराबर अर्थदण्ड भी लगाया जा सकता है। बता दें कि काले धन पर जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की तरफ से गठित की गई कमिटी ने भी ३  लाख रूपये से ज्यादा के नकद लेनदेन पर रोक लगाए जाने की सिफारिश की थी, जिसे सरकार ने सैद्धांतिक रूप से मान लिया।

अब मित्रों तनिक दृष्टि डाल देते हैं, न्यायालय के द्वारा दिए गए एक निर्णय पर:-

गणपति डीलकॉम प्राइवेट लिमिटेड  बनाम भारत सरकार (APO No. 8 of 2016) के मामले में  कलकत्ता उच्च न्यायालय के जस्टिस आईपी मुखर्जी और जस्टिस मोहम्मद निजामुद्दीन की डिवीजन बेंच ने दिनांक १२ दिसंबर २०१९ को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए यह स्थापित किया कि बेनामी संव्यवहार  (प्रतिषेध ) संशोधन अधिनियम २०१६  के प्रावधान पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective application) नहीं रखते अत: दिनांक १ नवंबर २०१६ से पूर्व किये गए संव्यवहारो पर लागू नहीं होते, क्योंकि इस संशोधन २०१६  में, इसे दिनांक १ नवम्बर २०१६ से पूर्व के संव्यवहारों पर लागू करने के संदर्भ में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं किया गया है, उच्च न्यायालय ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि :-

२०१६  का संशोधन अधिनियम, जो ०१ .११ .२०१६  को लागू हुआ, एक नया और वास्तविक कानून था, इसके अंतर्गत ‘बेनामी संपत्ति और बेनामी लेनदेन’ की परिभाषा को प्रतिस्थापित और विस्तृत करने , और  अन्य बातों के साथ-साथ, इसके  ०१ .११ .२०१६  से पूर्व  की अवधी के दौरान किये गए  किसी संव्यवहार या लेनदेन के ऊपर  पूर्वव्यापी संचालन ( Retrospective  Operation ) के लिए, उस प्रभाव का प्रावधान विशेष रूप से इस  अधिनियम के अंतर्गत  प्रदान किया जाना चाहिए था अत: ऐसे किसी स्पष्ट प्रावधान के अभाव में, केवल १९८८ के  अधिनियम की धारा १  की उप-धारा (३) में निहित प्रावधानों के आधार पर [जो २०१६  के संशोधन अधिनियम द्वारा अपरिवर्तित रहे, और परिणामस्वरूप जिन्हे बेनामी संपत्ति  अधिनियम के तहत बनाए रखा गया है] , २०१६ के संशोधन अधिनियम के प्रावधानों को पूर्वव्यापी के रूप में निहित नहीं किया जा सकता है;

अर्थात कलकत्ता उच्च न्यायालय के अनुसार चूँकि २०१६ के संशोधन अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान स्पष्ट रूप से नहीं दिया गया है, जो यह कहे कि ” २०१६ का संशोधन अधिनियम के प्रावधान १ नवम्बर २०१६ से पूर्व किये गए बेनामी संपत्ति के व्यवहारों या लेन देन पर भी लागू होंगे अत: इस संशोधन अधिनियम का कोई पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective Effect) नहीं होगा |

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने निहारिका जैन बनाम भारत संघ [एस.बी.सी.डब्ल्यू.पी. सं. २९१५/२०१९ ], तथा  जोसेफ इशरत बनाम श्रीमती रोज़ी निशिकांत गायकवाड़ [एस.ए. सं. ७४९ /२०१५ ; ०१ .०३ .२०१७ /३० .०३ .२०१७  में दिए गए निर्णय को दृष्टिगत करते हुए यह भी बताया कि ये २०१६ संशोधन अधिनियम के दंडात्मक प्रावधान अनुच्छेद २० (१) में प्रदान किये गए अधिकार का उलंघन करते हैं | 

मित्रों यंहा पर हम अनुच्छेद २० (१) के अंतर्गत दिए गए अधिकार को भी ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ते हैं:- इसके अनुसार “अपराध के रूप में आरोपित कार्य को करने के दौरान  लागू कानून के उल्लंघन के अलावा किसी भी व्यक्ति को किसी भी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जाएगा, और ना ही उस कानून के उलंघन के लिए निर्धारित ( आपराधिक कार्य करने के दौरान)  दंड से अधिक दंड उस व्यक्ति को दिया जा सकता है |”

दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा ६६ . प्रावधान करती है कि  “किसी भी बेनामी संपत्ति के संबंध में अधिकार को लागू करने के लिए कोई मुकदमा दायर  नहीं होगा, या तो उस व्यक्ति के खिलाफ, जिसके नाम पर ‘संपत्ति धारित है या किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ, या किसी व्यक्ति की ओर से जो इस आधार पर संपत्ति का असली मालिक होने का दावा करता है कि जिस व्यक्ति के नाम पर संपत्ति है वह दावेदार का बेनामीदार है। अर्थात धारा ६६ (१) कहती है कि ” न्यायालय द्वारा प्रमाणित खरीद के तहत हक का दावा करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ इस आधार पर कोई मुकदमा नहीं रखा जाएगा कि खरीद वादी की ओर से या किसी की ओर से की गई थी जिसके माध्यम से वादी का दावा है।

मित्रों  कलकत्ता उच्च न्यायालय के इस आदेश को चुनौती देते हुए केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और CIVIL APPEAL No. 5783 of 2022 [@ SPECIAL LEAVE PETITION (C) NO. 2784/2020] न्याय पटल पर प्रेषित किया |

आदरणीय सर्वोच्च न्यायालय (चीफ जस्टिस एनवी रमणा, जस्टिस कृष्णा मुरारी और जस्टिस हिमा कोहली) ने दोनों पक्षों के द्वारा प्रस्तुत किये गए तर्कों और  वितर्कों को ध्यान में रखते हुए निम्नाकिंत निष्कर्ष दिए अपने आदेश के माध्यम से :-

  • असंशोधित १९८८ अधिनियम की धारा ३  (२ ) को, स्पष्ट रूप से मनमाना होने के कारण असंवैधानिक घोषित किया गया है, तदनुसार, २०१६  के अधिनियम की धारा ३ (२ ) भी असंवैधानिक है क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद २० (१ ) का उल्लंघन है।
  • २०१६  के संशोधन अधिनियम से पहले, १९८८  के असंशोधित अधिनियम की धारा ५  के तहत जब्ती के प्रावधान, स्पष्ट रूप से मनमाना होने के कारण असंवैधानिक था।
  • २०१६  का संशोधन अधिनियम केवल प्रक्रियात्मक नहीं था, बल्कि निर्धारित मूल प्रावधान था।
  • २०१६  के अधिनियम की धारा ५  के तहत जब्ती के प्रावधान में, प्रकृति में दंडात्मक होने के कारण, केवल भावी रूप से लागू किया जा सकता है, पूर्वव्यापी रूप से नहीं।

तो मित्रों इस प्रकार हमने देखा कि बेनामी संपत्ति क्या है, इसके मुख्य कारक कौन कौन से हैं और सर्वोच्च न्यायालय का २०१६ के  संशोधन अधिनियम के प्रावधानों के प्रति क्या विचार और निर्णय है| केंद्र सरकार को इस अधिनियम में उत्पन्न हुई तकनिकी खामियों को दूर करके बेनामी सम्पत्ति के लेनदेन को कठोरता से रोकना चाहिए |

Article written by Nagendra Paratap Singh (Advocate)

aryan_innag@yahoo.co.in

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