न्यायसूत्र:-अंग्रेजो के Jurisprudence का आधार!
महर्षि गौतम
प्राचीन भारत की न्यायिक व्यवस्था
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जैसा की हम जानते हैं कि #न्यायसूत्र, भारतीय दर्शन के छ: स्त्रोतो मे से एक है ! यह प्राचीन ग्रन्थ है। इसके रचयिता अक्षपाद गौतम हैं जिन्हे महर्षि गौतम भी कहते हैं। यह न्यायदर्शन का सबसे प्राचीन रचना है। इसकी रचना का समय दूसरी शताब्दी ईसापूर्व है।
इसका प्रथम सूत्र है –
प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्तावयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-वितण्डाहेत्वाभास-च्छल-जाति-निग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः
(प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अयवय, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान के तत्वज्ञान से मुक्ति प्राप्त होती है।)
वह शास्त्र जिसमें किसी वस्तु के यथार्थ ज्ञान के लिये विचारों की उचित योजना का निरुपण होता है, न्यायशास्त्र कहलाता है।
यह विवेचनपद्धति है। न्याय, छह भारतीय दर्शनों में से एक दर्शन है। न्याय विचार की उस प्रणाली का नाम है जिसमें वस्तुतत्व का निर्णय करने के लिए सभी प्रमाणों का उपयोग किया जाता है।
वात्स्यायन ने न्यायदर्शन प्रथम सूत्र के भाष्य में “प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्याय” कह कर यही भाव व्यक्त किया है।
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भारत के विद्याविद् आचार्यो ने विद्या के चार विभाग बताए हैं-
?आन्वीक्षिकी, Science of Inquiry/systmetic Philosophy
?त्रयी, Science of Cuses
?वार्ता Science of discussionऔर
?दण्डनीति। Science of Punishment
आन्वीक्षिकी का अर्थ है- प्रत्यक्षदृष्ट तथा शास्त्रश्रुत विषयों के तात्त्विक रूप को अवगत करानेवाली विद्या। इसी विद्या का नाम है- न्यायविद्या या न्यायशास्त्र ; जैसा कि वात्स्यायन ने कहा है :
प्रत्यक्षागमाभ्यामीक्षितस्यान्वीक्षामन्वीक्षा, तया प्रवत्र्तत इत्यान्वीक्षिकीन्यायविद्यान्यायशास्त्रम् (न्यायभाष्य 1 सूत्र)
आन्वीक्षिकी में स्वयं न्याय का तथा न्यायप्रणाली से अन्य विषयों का अध्ययन होने के कारण उसे न्यायविद्या या न्यायशास्त्र कहा जाता है।
आन्वीक्षिकी विद्याओं में सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। वात्स्यायन ने अर्थशास्त्राचार्य चाणक्य के निम्नलिखित वचन को उद्धृत कर आन्वीक्षिकी को समस्त विद्याओं का प्रकाशक, संपूर्ण कर्मों का साधक और समग्र धर्मों का आधार बताया है-
प्रदीपः सर्वशास्त्राणामुपायः सर्वकर्मणाम्। आश्रय: सर्वधर्माणां सेयमान्वीक्षिकी मता। (न्यायभाष्य , सूत्र १)
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न्याय के प्रवर्तक गौतम ऋषि कहे जाते हैं। गौतम के न्यायसूत्र अबतक प्रसिद्ध हैं। इन सूत्रों पर वात्स्यायन मुनि का भाष्य है। इस भाष्य पर उद्योतकर ने वार्तिक लिखा है। वार्तिक की व्याख्या वाचस्पति मिश्र ने ‘न्यायवार्तिक तात्पर्य ठीका’ के नाम से लिखी है।
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इस टीका की भी टीका उदयनाचार्य कृत ‘ताप्तर्य-परिशुद्धि’ है। इस परिशुद्धि पर वर्धमान उपाध्याय कृत ‘प्रकाश’ है।
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न्यायविद् विद्वानों ने निश्रेयस को न्यायशास्त्र के अध्ययन का प्रयोजन माना है। नि:श्रेयस का अर्थ है- अपवर्ग, मोक्ष अर्थात् सब प्रकार के दु:खों की आत्यंतिक निवृत्ति। ऐसी निवृत्ति जिसके बाद कभी किसी प्रकार के दु:ख होने की संभावना ही नहीं रह जाती। यही मनुष्य के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चतुर्विध पुरुषार्थों में सर्वश्रेष्ठ पुरुषार्थ है।
न्यायशास्त्र के अध्ययन से पदार्थों का तत्वज्ञान होता है और उससे आत्मतत्व का साक्षात्कार होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
?तत्व Fact साक्षात्कार से मिथ्याज्ञान की निवृत्ति, ??मिथ्याज्ञान की निवृत्ति से राग, द्वेष और मोह रूपी दोषों की निवृत्ति,
?दोषों की निवृत्ति से अर्ध एवं
?अर्ध रूप प्रवृत्ति की निवृत्ति से पुनर्जन्म का अभाव ?और पुनर्जन्म के अभाव से समस्त दु:खों से आत्यंतिक मुक्ति होती है। जैसा कि गौतम ने कहा है :
दु:ख जन्मप्रवृत्तिदोष मिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनंतरा पायादप वर्ग:। (न्या.सू., अ. 1 आ. 1 सूत्र 2)
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आन्वीक्षिकी’, ‘तर्कविद्या’, ‘हेतुवाद’ का निदापूर्वक उल्लेख रामायण और महाभारत में मिलता है। रामायण में तो नैयायिक शब्द भी अयोध्याकांड में आया है। पाणिनि ने न्याय से नैयायिक शब्द बनने का निर्देश किया है।
?आपस्तंब धर्मसूत्र में जो न्याय शब्द आया है उसका पूर्वमीमांसा से ही अभिप्राय समझना चाहिए। माधवाचार्य ने पूर्वमीमांसा का जो सारसंग्रह लिखा उसका नाम ‘न्यायमाला-विस्तार’ रखा।
?वाचस्पति मिश्र ने भी ‘न्यायकणिका’ के नाम से मीमांसा पर एक ग्रंथ लिखा है। पर न्याय के प्राचीनत्व से बंगाल का गौरव समझनेवाले कुछ बंगाली पंडितों का कथन है कि न्याय ही सब दर्शनों में प्राचीन है क्योंकि और सब दर्शनसूत्रों में दूसरे दर्शनों का उल्लेख मिलता है पर न्यायसूत्रों में कहीं किसी दूसरे दर्शन का नाम नहीं आया है। यद्यपि यह नहीं कहा जा सकता कि न्याय सब दर्शनों में प्राचीन है, पर इतना अवश्य कह सकते हैं कि तर्क के नियम बौद्ध धर्म के प्रचार से बहुत पूर्व प्रचलित थे, चाहे वे मीमांसा के रहे हों या स्वतंत्र।
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प्राचीन भारतीय व्यवस्थाकारो ने समाज एवं मनुष्य को व्यवस्थित और नियंत्रित रख उनमे परस्पर सामंजस्य व समन्वय स्थापित करने के लिए अनेक मान्य परंपराओं, प्रथाओं तथा विधानों को लिपिबद्ध किया है, और उन्हीं नियमों को विधि और कानून की संज्ञा प्रदान की गयी।
?ये विधिक सिद्धांत, राज्य—संस्था द्वारा अनुमोदित व स्वीकृत होने के पश्चात ही अस्तित्व मे आये और इसी कारण इनके अनुपालन में राज्यशक्ति का प्रयोग आवश्यक हुआ।
?हमारे देश मे वैदिक युग से ही विधि एवं विधिक संस्थाओं की स्थापना प्रारंभ हो गयी थी। वैदिक साहित्य में विधि द्वारा न्याय करने के संकेत मिलते हैं।
?उत्तर वैदिक काल में धर्मशास्त्रों, सूत्रसाहित्यों तथा स्मृतिग्रंथों में विभिन्न प्रकार से विधि का स्वरूप र्नििमत हुआ। सूत्र साहित्य में विधि का मुख्य आधार वेदों को ही माना गया। ये संपूर्ण सृष्टि मे सबसे प्राचीन पुस्तके हैं जो मूलत: चार प्रकार के हैं
रिग्वेद
सामवेद
यजुर्वेद
अथर्ववेद
ये देववाणी मे रचित है!
ईसके अलावा चार उपवेद हैं, 18 पूराण हैं, 29 उपनिषद हैं रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य है और ये सभी न्याय, विधी और विधी को अनुपालन की व्यवस्था का विस्तार से वर्णन करते हैं!
?आपस्तम्ब—धर्मसूत्र के अनुसार धर्म—व्यवस्था के मूल स्त्रोत वेद हैं तथापि इतिहास, स्मृति और आचार से भी धर्म—व्यवस्था का बोध होता है।
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वैदिक युग में वरुण अर्थात पवन को प्रशासन और न्याय का अधिष्ठातृ—देवता कहा गया है, वरूण के प्रतिनिध के रूप में राजा इस मृत्यु लोक में राज्य करता है, जो पापियों अपराधियों, दुष्टो, असमाजिक तत्वो, को यथोचित दण्ड देता है और सज्जनों के साथ न्याय करते हुये उनकी रक्षा करता है।
?महावीर चरित नाटक में कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रजाजनों के विरुद्ध आचरण करता है और जान बूझकर पाप और अपराध करता है, उसको राजा अवश्य दण्ड देता है।
?प्राचीन भारतीय समाज—व्यवस्था उन व्यक्तियों द्वारा र्नििमत की गयी थी, जो समस्त जीवन का अनुभव प्राप्त किये हुए मनुष्य की चरम अवस्था को प्राप्त कर, सांसारिक जीवन के स्वार्थों से र्निलिप्त थे और जो समाज की व्यवस्था—निर्माण के लिए सबसे अधिक योग्य थे।
जैसे महर्षि वशिष्ठ, महर्षि अगस्त्य, महर्षि, विश्वामित्र, महर्षि दुर्वासा, महर्षि मनु, महर्षि वाल्मिकी, महर्षि अत्रेय, ?महर्षि वेदव्यास (वेदांत सुत्र), ?महर्षि गौतम(न्याय सुत्र), ?महर्षि कणाद (वैशेषिका सुत्र)?महर्षि जैमिनी(मिमांसा सुत्र), ?महर्षि पतंजलि(योग सुत्र),? महर्षि कपिल(सांख्यिकी सुत्र) व महर्षि भारद्वाज ईत्यादी!
? यह व्यवस्था ‘आप्त’ वाक्यों के रूप में श्रुति—साहित्य; वेदों, ब्राह्मणों, आरण्यकों तथा उपनिषदों में दी गयी थी और आगे चलकर जिनका स्पष्टीकरण नियमों तथा उपनियमों के रूप में स्मृतियों, दर्शन शास्त्रों धर्मसूत्रों तथा वेदांगों आदि में किया गया था।
?प्राचीन भारत में समाज के नियम बनाने का अधिकार राज्य को प्राप्त नहीं था। भारतीय विचारकों तथा समाज—व्यवस्थापकों की धारणा थी कि
?राजतंत्रात्मक,
?गणतंत्रात्मक या
?कुलीनतंत्रात्मक किसी भी राज्य का अधिकार जिन लोगों के पास रहता है, वे सांसारिक दृष्टि से महत्त्वाकांक्षी होते हैं और अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए अथवा अपनी महत्त्वाकांक्षा की र्पूित के लिए वे समस्त उपायों या युक्तियों को करने के लिए तत्पर रहते हैं, वे निष्पक्ष और र्नििलप्त रूप में सांसारिक जीवन के संघर्षों और स्वार्थों से ऊपर उठकर विचार कर ही नहीं सकते, अत: ऐसे व्यक्तियों के हाथों में समाज के नियम बनाने का अधिकार देना उन्हें मान्य नहीं था।
?यही कारण है कि समाज के नियम तथा उन नियमों के स्पष्टीकरण के अधिकार के लिए ‘परिषद्’ नाम की एक संस्था का निर्माण किया गया। ‘परिषद्’ के विषय में मनुस्मृति में कहा गया है कि इस स्मृति में बताये गये धर्म के विषय में यदि कोई शंका हो तो जिस नियम को शिष्ट ब्राह्मण मान्यता दे, उसी को शंकारहित होकर धर्म समझना चाहिये अथवा दस या तीन श्रेष्ठ ब्राह्मण की ‘परिषद्’ में धर्म का निर्णय होना चाहिए।
?याज्ञवल्क्य व पाराशरस्मृतियों तथा गौतमधर्मसूत्र में भी परिषद् के संबंध में इसी प्रकार के विचार व्यक्त किये गये हैं कि धर्म—संशय के निर्णय के लिए तीन व्यक्तियों की परिषद् में ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद के ज्ञाता ही रहने चाहिए।
✊समाज—व्यवस्था के नियमों का समावेश सर्वप्रथम धर्मशास्त्रों; जिनके अन्तर्गत श्रुति, स्मृति, इतिहास—पुराण आदि आते हैं; में किया गया; इनमें राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, वैयक्तिक, शैक्षिक, वैवाहिक आदि सभी प्रकार के नियमों का समावेश किया गया था। इस दृष्टि से धर्मशास्त्रों के नियम भी विधि के रूप में मान्यता रखते हैं।
?किन्तु इसका यह अर्थ नहीं था कि राज्य कोई नियम ही नहीं बना सकता था। राज्य की आज्ञा द्वारा जो नियम लागू किये जाते थे, उन्हें ही ‘राज्यानुशासन’ कहा गया है।
?कौटिल्य (जिन्हे आचार्य विष्णुगुप्त या चाणक्य के नाम से भी जाना जाता है) अर्थशास्त्र नामक ग्रंथ की रचना की और उन्होने ने विधि के चार स्रोतों का वर्णन करते हुए कहा है कि
धर्म,
व्यवहार,
चरित्र और
राज्यानुशासन व्यवहार के चार पद हैं। इनमें धर्म सत्य में, व्यवहार साक्षियों पर, चरित्र मनुष्यों के संग्रह में और राज्यानुशासन राज्य की आज्ञा में स्थित है!
✊व्यवहार :-धर्मशास्त्रों तथा विधिशास्त्रों में आपसी विवादों के नियमों को व्यवहार नाम से संबोधित किया गया है। व्यवहार का अर्थ पारस्परिक विवाद के विविध संदेहों को हरण करने के साधन से है।
व्यवहार के नियम धर्मसम्मत होते थे। शुक्रनीति और याज्ञवल्क्यस्मृति में कहा गया है कि स्मृतियों और आचार के उल्लंघन से यदि कोई दूसरों द्वारा पीड़ित हो और वह राजा के यहाँ आवेदन करे, तो वह क्रिया व्यवहार पद है।
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प्राचीन भारतीय मनीषियों एवं राजनैतिक चितकों ने राज्य संरचना एवं समाज संरचना में ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया कि सभी प्रकार की विधियों का निर्णय उपयुक्त व्यक्तियों द्वारा हो, जो उन नियमों की भावनाओं को ठीक प्रकार से समझ सके और जो उन नियमों के प्रयोग में अधिकृत रीति से बोल सके।
?काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि को मनुष्य का प्रबल शत्रु माना गया है। इनके वशीभूत होकर मनुष्य अपने धर्म का उल्लंघन कर अन्य व्यक्तियों को कष्ट अथवा हानि पहुँचाता है, जो समाज में कलह और द्वेष—भावना की वृद्धि का कारण बन जाता है, उस द्वेष और कलह की भावना को रोकने के लिए प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रकारों ने न्याय व्यवस्था का विधान किया था।
? राज्य एवं शासन—संस्था के विकास के साथ—साथ प्राचीन काल में न्याय—व्यवस्था का भी समुचित विकास हुआ। सर्वमान्य जनता को अराजक स्थिति से मुक्ति दिलाने तथा सुखी जीवन व्यतीत करने के लिए एक सुव्यवस्थित शासनपद्धति ने जन्म लिया।
?किसी विषय में विवाद उपस्थित होने पर पहले इसका निर्णय आवश्यक होता है कि दोनों वादियों के कौन कौन प्रमाण माने जायँगे। इससे पहले ‘प्रमाण’ लिया गया है।
? इसके उपरांत विवाद का विषय अर्थात् ‘प्रमेय’ का विचार हुआ है।
?विषय सूचित हो जाने पर मध्यस्त के चित्त में संदेह उत्पन्न होगा कि उसका यथार्थ स्वरुप क्या है। उसी का विचार ‘संशय’ या ‘संदेह’ पदार्थ के के नाम से हुआ है।
?संदेह के उपरंत मध्यस्थ के चित्त में यह विचार हो सकता है कि इस विषय के विचार से क्या मतलब। यही ‘प्रयोजन’ हुआ।
?वादी संदिग्ध विषय पर अपना पक्ष दृष्टांत दिखाकर बदलाता है, वही ‘दृष्टांत’ पदार्थ है।
?जिस पक्ष को वादी पुष्ट करके बतलाता है वह उसका ‘सिद्धांत’ हुआ।
?वादी का पक्ष सूचित होने पर पक्षसाधन की जो जो युक्तियाँ कही गई हैं प्रतिवादी उनके खँड खँड करके उनके खंडन में प्रवृत्त होता है।
?युक्तियों की खंडित देख वादी फिर से और युक्तियाँ देता है जिनसे प्रतिवादी की युक्तियों का उत्तर हो जाता है। यही ‘तर्क’ कहा गया है।
?तर्क द्वारा पंचावयवयुक्त युक्तियों का कथन ‘वाद’ कहा गया है।
? वाद या शास्त्रार्थ द्वारा स्थिर सत्य पक्ष को न मानकर यदि प्रतिवादी जीत की इच्छा से अपनी चतुराई के बल से व्यर्थ उत्तर प्रत्युत्तर करता चला जाता है तो वह ‘जल्प’ कहलाता है।
? इस प्रकार प्रतिवादी कुछ काल तक तो कुछ अच्छी युक्तियाँ देता जायगा फिर ऊटपटाँग बकने लगेगा जिसे ‘वितंडा’ कहते हैं।
?इस वितंडा में जितने हेतु दिए जायँगे वे ठीक न होंगे, वे ‘हेत्वाभास’ मात्र होंगे।
?उन हेतुओं और युक्तियों के अतिरिक्त जान बूझकर वादी को घबराने के लिये उसके वाक्यों का ऊटपटाँग अर्थ करके यदि प्रतिवादी गड़बड़ डालना चाहता है तो वह उसका ‘छल’ कहलाता है
?और यदि व्याप्तिनिरपेक्ष साधर्म्य वैधर्म्य आदि के सहारे अपना पक्ष स्थापित करने लगता है तो वह ‘जाति’ में आ जाता है।
?इस प्रकार होते होते जब शास्त्रार्थ में यह अवस्था आ जाती है कि अब प्रतिवादी को रोककर शास्त्रार्थ बंद किया जाय तब ‘निग्रहस्थान’ कहा जाता है।
इस व्यवस्था के लिए आवश्यक था कि सामान्य जन भी परस्पर न्यायोचित व्यवहार कर राज्य के नियमों का पालन करें।
? प्राचीन भारत में न्याय व्यवस्था और प्रशासन के दो मुख्य उद्देश्य थे:-
पहला सत्य का ज्ञान करना और
दूसरा न्याय से संबन्धित वादों के नियमों का पालन करना और कराना।
राजा की तुलना एक शल्यचिकित्सक से करते हुए कहा गया है कि वह आवश्यकता पड़ने पर अंगच्छेदन भी करता है।
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न्यायालय विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों, नियुक्तों—अनियुक्तों एवं चरों आदि से सत्य की जानकारी प्राप्त करके ही विधि का कार्यान्वयन करता है, क्योंकि सत्य का ज्ञान प्राप्त करना ही न्याय का मुख्य उद्देश्य हैं
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प्राचीन भारत में राजा विधि निर्माण के स्थान पर न्यायिक प्रशासन का नेतृत्व करता था। न्यायाधीधों पर भी विधि के अतिरिक्त अन्य कोई दबाव नहीं था।
कार्यपालिका और न्यायपालिका के क्षेत्र अलग—अलग निर्धारित थे। यद्यपि दोनों का अध्यक्ष एक ही होता था। न्यायिक प्रशासन में समाज द्वारा स्वीकृत नियमों का विशेष प्रभाव था और न्यायिक प्रशासन भी सामाजिक परिवर्तनों को स्वीकार करता था।
अश्वघोष के अनुसार न्याय का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र में सुख और समृद्धि का प्रसार करना था, ताकि सबल व्यक्ति दुर्बलों को न सताने पाए। दण्ड्य व्यक्ति दण्ड से मुक्त न हो और अदण्ड्य व्यक्ति दण्डित न हो।
प्राचीन भारत में राज्य प्रशासन का महत्त्व न्यायिक प्रशासन में अधिक नहीं था और वह स्वयं ऐसा कोई आदेश नहीं कर सकता था, जो देशदृष्ट एवं शास्त्रसम्मत नियमों के विरुद्ध हो।
स्वाभाविक रूप से प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों में अनेक ऐसे निर्देश विद्यमान हैं, जिनसे पता चलता है कि स्वयं राजा भी विधि के अधीन था और न्याय से ऊपर नहीं था। अपराध सिद्ध हो जाने पर राजा भी दण्डित होता था। मनुस्मृति में स्पष्ट व्यवस्था दी गयी है कि जिस अपराध के लिए साधारण व्यक्ति को एक कार्षापण का दण्ड दिया जाए, उसके लिए राजा को एक सहस्र कार्षापण का दण्ड दिया जाना चाहिए।
प्राचीन भारतीयशास्त्रों के अनुसार राज्य का सर्वोच्च अधिकारी राजा को माना गया है और उसे ‘न्याय का आस्पद’ कहा गया है। न्याय करना राजा के पद का कर्तव्य माना गया है।
भास के अनुसार राजा दुष्टों को दण्ड देकर प्रजा के पारस्परिक विवादों को शान्त कर राज्य में शांति स्थापित करता है।
मालविकाग्निमित्र में राजा अग्निमित्र प्रजा को न्याय देने में संलग्न बताया गया है। राजा के लिए सबसे बड़ा यज्ञ उचित न्याय की व्यवस्था मानी गयी है, यही कारण है कि वह समाज और विधि की मर्यादाओं के अंतर्गत रहकर न्याय का आयोजन करता था।
राजा का कर्तव्य था कि अपराधी को दण्ड मिले तथा निरपराध व्यक्ति दण्डित न होने पाये। बुद्धचरित में अश्वघोष ने राजा शुद्धोधन की धर्मनिष्ठा और कर्तव्यपरायणता का उल्लेख करते हुए कहा है कि राजा अपराध करने वालों को दण्ड देता था, यद्यपि उसे क्षमा का भी अधिकार था, किन्तु अपराधियों को छोड़ा नहीं जाता था। निष्पक्ष न्याय करने वाले राजा को वही फल मिलता है जो पवित्र यज्ञ करने से प्राप्त होता है।
निरपराधियों को दण्ड देने वाले राजा के लिए न केवल नरक का भय था अपितु प्रजा भी उसके प्रति विद्रोह कर सकती थी। राज द्वारा न्याय के नियमों का पालन न करने पर राज्य में क्रांति का भी भय हो सकता था।
राजा स्वयं समस्त राज्य के विवादों का निर्णय नहीं कर सकता था अत: ग्रामस्तर से लेकर राष्ट्रस्तर तक के न्यायालयों की स्थापना करके उनमें न्यायाधीशों की नियुक्ति करता था।
किन्तु अन्तिम निर्णय राजा का ही मान्य होता था। राजा ही न्याय का अंतिम उत्तरदायी था। राजा कर्तव्यानुसार राजसभा में स्वयं उपस्थित होकर समस्त विवादों का निर्णय करता था। उत्तररामचरित में भवभूति ने राजा को धर्मासन पर बैठकर स्वयं न्याय करते हुए बताया है!
न्यायालयों का संगठन
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राज्यों के विस्तार और साम्राज्यों की स्थापना के साथ—साथ न्याय का क्षेत्र भी बढ़ गया था। समस्त विवादों का समाधान राजा द्वारा किया जाना संभव नहीं था अत: राजा न्याय—निर्णय हेतु अमात्यों, पुरोहितों और न्याय—सभा की सहायता लेने लगे थे।
प्राचीन भारतीय विधिशास्त्रों में राजा द्वारा न्यायनिष्पादन हेतु न्यायालयों की स्थापना का सिद्धान्त मान्य था। प्राचीन भारतीय साहित्य में इनको ‘अधिकरण’ कहा गया है।
स्मृति—साहित्य में इन न्यायालयों के लिए धर्मस्थान, धर्मासन, धर्माधिकरण आदि शब्द प्रयुक्त किये गये हैं।
मृच्छकटिक में इनको व्यवहार—मण्डप और अधिकरण—मण्डप नामों से अभिहित किया गया है।
व्यवहार—प्रकाश में पृथ्वीचन्द ने वात्स्यायन के मत को उद्धृत करते हुए न्यायालय को धर्माधिकरण शब्द से संबोधित किया है क्योंकि वहाँ धर्मशास्त्रों के आधार पर ही विवादों का निर्णय किया जाता था।
प्राचीन साहित्य में स्थूल रूप में दो प्रकार के न्यायालयों का उल्लेख मिलता है :—१. राज न्यायालय, २. अन्य न्यायालय।
राज न्यायालय वह सभा थी, जहाँ राजा ही सर्वोच न्यायाधीश होता था। अन्य प्रकार के न्यायालयों को क्षेत्रीय न्यायालय कहा जा सकता है, जो क्रमानुसार छोटे—बड़े स्तर के होते थे।
राज न्यायालय के भी दो रूप थे—एक में मुख्य न्यायाधीश के रूप में राजा स्वयं उपस्थित होता था, दूसरे प्रकार के न्यायालयों के लिए वह किसी योग्य व्यक्ति को न्यायाधीश नियुक्त कर देता था। अन्य न्यायालयों में कुल, श्रेणी, पूग एवं गण आदि के अपने न्यायालय थे, जिन्हें केवल सीमित क्षेत्र में ही न्याय करने का अधिकार प्राप्त था।
श्रेणी:- एक ही प्रकार की वृत्ति करने वाले राज्यसम्मत व्यापारिक संगठनों को श्रेणी कहा जाता था। राजा द्वारा श्रेणियों को नियमों, परम्पराओं आदि के अनुसार अपने स्वयं के विवादों को सुलझाने हेतु मान्यता प्रदान की गयी थी।
इन श्रेणियों अथवा संघों के नियमों को राजकृत नियमों के समान ही मान्यता प्राप्त थी। ये संघ स्वयं अपने विवादों को हल करते थे तथा अयोग्य और भ्रष्ट कर्मचारियों को दण्ड देते थे।
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यदि श्रेणीप्रमुख दुर्भावना अथवा घृणावश किसी व्यक्ति के साथ अन्याय करता था तो राजा उसे दण्डित करने का अधिकारी था क्योंकि श्रेणी—प्रमुख राजा से ही अधिकार प्राप्त करके न्याय करते थे।
आचार्य चाणक्य ने दो प्रकार के न्यायालयों का उल्लेख किया है—धर्मस्थीय और कण्टकशोधन।
धर्मस्थीय न्यायालयों के न्यायाधीशों को धर्मस्थ ओर कण्टकशोधन न्यायालयों के न्यायाधीश को प्रदेष्टा नाम से अभिहित किया गया है।
राजकीय न्यायाधिकरणों के अतिरिक्त विभिन्न विभागों के अपने प्रशासनिक न्यायाधिकरण भी होते हैं, जिन्हें अपने विभागों के अधिकारियों के मामलों में विवादों के निस्तारण का अधिकार था।
उदाहरण:-एक वेश्या द्वारा अपनी पुत्री को आधे पण के लिए कुमारामात्य के अधिकरण में ले जाने का उल्लेख श्यामिलक के पादताडितक नामक भाण में प्राप्त होता है।
न्यायधिशो की नियुक्ति
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न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय विशेष सतर्कता बरती जाती थी। इसके लिए यह आवश्यक था कि वह व्यक्ति गुणसंपन्न, योग्य, उदार, कुलीन, उद्वेगरहित, स्थिर, क्रोध रहित और र्धिमष्ठ होना चाहिए।
?न्यायाधीश के लिए धर्मशास्त्रों का ज्ञाता होने के साथ—साथ चरित्रवान होना भी आवश्यक था। मत्तविलास प्रहसन के अनुसार उसे कुटिलतारहित, स्थिरस्वभाव, कोमलवृत्ति, उत्तम कुल में उत्पन्न तथा आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता, दण्डनीति, श्रुति, स्मृति आदि में पारंगत होना चाहिए।
?व्यवहारप्रकाश के अनुसार न्यायाधीश ब्राह्मण वर्ण का होना चाहिये, योग्य ब्राह्मण के न मिलने पर क्षत्रिय या वैश्य व शुद्र को भी ‘न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है, यहाँ कर्म की प्रधानता के आधार पर ही वर्णविभेद है!
न्यायीक प्रक्रिया
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प्राचीन भारतीय न्याय—प्रक्रिया अत्यधिक सरल थी। न्याय के इच्छुक वादी को अपनी याचिका के साथ न्यायालय में उपस्थित होना पड़ता था।
न्यायालय में प्रस्तुत मुकदमों को ‘व्यवहार’ तथा व्यवहार के लिए आने वाले व्यक्ति को ‘अभ्यर्थी’ कहा जाता था।
याचिकाओं को प्रस्तुत करने के विशेष नियम थे। याचिका लिखित रूप में शुद्ध और संक्षिप्त होनी आवश्यक थी। याचिका के अशुद्ध होने पर वादी की याचिका अमान्य कर दी जाती थी। याचिका में सभी तथ्यों का समावेश तथा वह दायें हाथ से न्यायालय में प्रस्तुत की जाये, इस प्रकार का विवरण युक्तिकल्पतरु तथा नारदस्मृति में दिया गया है।
जो व्यक्ति; जैसे स्त्री, बालक, वृद्ध, अनाथ, रुग्ण अथवा जिन व्यक्तियों को न्यायालय में उपस्थित होने की छूट थी जैसे—देव, ब्राह्मण, ऋषि, तपस्वी आदि; शारीरिक रूप से स्वयं उपस्थित होने में असमर्थ होते थे, उनके पक्ष को राजकर्मचारी प्रस्तुत कर सकता था।
अभ्यर्थी की याचिका प्रस्तुत होने पर प्रतिवादी अथवा प्रत्यर्थी को उसकी सूचना भेजी जाती थी। यह कार्य श्रावणिक नामक कर्मचारी द्वारा संपन्न किया जाता था।
निर्धारित सुनवाई के दिन धर्मासनिक के आदेश पर श्रावणिक, वादी तथा प्रतिवादी को पुकारता था तथा वाद पर सुनवाई प्रारंभ होती थी।
न्यायाधीश दोनों पक्षों को सुनकर एवं न्यायसभा के सदस्यों के परामर्श करने के उपरांत या तो स्वयं निर्णय देता था अथवा महत्त्वपूर्ण विवादों को राजा के निर्णय के लिए सुरक्षित रख लेता था।
किसी भी ‘व्यवहार’ पर अंतिम निर्णय का अधिकार राजा के पास सुरक्षित होता था।
उदाहरण :-मृच्छकटिक से ज्ञात होता है कि चारुदत्त वसन्तसेना की हत्या का अपराधी था। अपराध के प्रमाणित होने पर न्यायाधिकरण द्वारा देश निर्वासन के दण्ड की संस्तृति की गयी थी परन्तु राजा ने इस संस्तुति को अमान्य करते हुए चारुदत्त को मृत्युदण्ड दिया।
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मृच्छकटिक ने न्याय प्रक्रिया के संबंध में और भी विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। तदनुसार व्यवहार मण्डप के मुख्य द्वार पर एक दौवारिक या द्वारपाल नियुक्त रहता था, जो दण्डनायक की अनुमति पाने पर पूछता था कि कौन लोग कार्यार्थी हैं अर्थात् मुकदमा दायर करना चाहते हैं।
उसके उपरांत वादी न्यायालय में अपना वाद प्रस्तुत करता था। तदुपरांत न्यायालय से सूचना मिलने पर प्रतिवादी निश्चित तिथि पर उपस्थित होकर अपना पक्ष रखता था।
न्यायालय द्वारा वाद के पक्ष में प्रमाण माँगा जाता था और संबन्धित पक्षों की गवाही भी ली जाती थी। तपस्वी, दानशील, कुलीन, सत्यवादी, पुत्रवान् धर्मनिष्ठ तथा धनी व्यक्तियों का साक्ष्य उचित माना जाता था। बालक, पाखण्डी, उन्मत्त (पागल), लूले एवं लँगड़े व्यक्ति गवाही के योग्य नहीं माने जाते थे।
न्यायालयों में वादी—प्रतिवादी तथा गवाहों को शपथ लेनी होती थी—ब्राह्मण को सत्य, क्षत्रिय को वाहन या आयुध, वैश्य को गाय, बीज अथवा सुवर्ण तथा शूद्र को समस्त पापों से शपथ लेनी पड़ती थी। झूठी शपथ लेना निदनीय भी था और अपराध भी! यहाँ वर्ण विभेद कर्म के आधार पर होता था!
विवादों के निर्णय में साक्षियों का बहुत अधिक महत्त्व था। प्राचीन समय में दो प्रकार के साक्ष्य प्रचलित थे—
मौखिक साक्ष्य और
लिखित साक्ष्य।
वादी और प्रतिवादी अपने—अपने कथनों को सिद्ध करने के लिए मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत करते थे।
साक्ष्य देने से पूर्व साक्षी को सत्य बोलने की शपथ ग्रहण करनी होती थी। न्यायालय द्वारा बुलाये जाने पर साक्षी का न्यायालय में उपस्थित न होना दण्डनीय अपराध था, जिसके लिए अर्थ—दण्ड का प्रावधान था।
मौखिक साक्ष्य की अपेक्षा लिखित साक्ष्य को अधिक प्रामाणिक माना जाता था। साक्ष्य में उभय पक्ष के हस्ताक्षर न होने पर उसे प्रमाणित नहीं माना जाता था।
लिखित साक्ष्य चार वर्गों में विभाजित थे—????स्वहस्तलिखित,
?अन्यहस्तलिखित,
?लौकिक तथा
?राजकीय मुद्रा से अंकित।
लौकिक साक्ष्यों के अभाव में दिव्य साक्ष्यों की व्यवस्था की गयी थी।
मृच्छकटिक में चार प्रकार के दिव्य साक्ष्यों अथवा परीक्षाओं का उल्लेख आया है—विष, जल, तुला और अग्नि के माध्यम से परीक्षा जो वर्णाश्रित थीं।
? ब्राह्मण, बालक, वृद्ध, अन्धे तथा रुग्ण व्यक्ति के लिए तुला परीक्षा,
?क्षत्रियों के लिए अग्नि, वैश्यों तथा शूद्रों के लिए विष परीक्षा लिये जाने की जानकारी प्राप्त होती है। उदाहरण:-हनुमन्नाटक में सीता की अग्नि परीक्षा का उदाहरण है। अपने सतीत्व को प्रमाणित करने के लिए सीता अग्नि में कूद गयी थी, परन्तु अग्नि उसको जला नहीं सकी।
प्राचीन भारत में यद्यपि न्याय—व्यवस्था अत्यधिक सरल, सुव्यवस्थित एवं पक्षपातरहित थी तथापि चौथी शताब्दी ई. तक आते—आते उसमें पक्षपात एवं भ्रष्टाचार प्रारंभ हो गया था।
मृच्छकटिक में विवरण आया है कि राजा का साला शकार, चारुदत्त पर न्यायालय में वसन्तसेना की हत्या करने का अभियोग प्रस्तुत करते समय, न्यायाधीश को राजा का भय दिखाकर प्रभावित करने का प्रयास करता है।
पादताडितक भाण से ज्ञात होता है कि उस समय न्याय व्यवस्था काफी पंगु हो गई थी उसमें भ्रष्टाचार तथा पक्षपात व्याप्त हो गया था।
?इस संबंध में एक उदाहरण मिलता है कि मदयन्ती नामक एक वेश्या, उपगुप्त से आधा पण धन के लिए न्यायालय की शरण में गयी थी। ये विवरण भी मिलते हैं कि मुकदमा सुनते समय प्राड्विवाक विष्णुदास ऊँघता रहता था और न्यायालय के अधिकारी, पुस्तपाल, कायस्थ, काष्ठक और महत्तर रिश्वत माँगते थे। यह सब भ्रष्टाचार और अव्यवस्था देखकर उपगुप्त ने सोचा कि रिश्वत देने से अच्छा तो यही है कि वेश्या को ही धन दे दिया जाये।
? मत्तविलासप्रहसन’ से भी यही संकेत मिलता है कि न्यायालय के कर्मचारी रिश्वत लेकर न्याय के विपरीत निर्णय दे देते थे।
न्याय—व्यवस्था में व्यापृग कर्मचारी
?????????????
प्राचीन भारतीय साहित्य से जानकारी प्राप्त होती है कि न्यायाधीशों के अतिरिक्त न्याय—प्रक्रिया में सहायता प्रदान करने हेतु विभिन्न कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती थी यथा—धर्माधिकारी, प्राड्विवाक, सभ्य, पुरोहित, ग्रामणी, कायस्थ, पुस्तपाल, काष्ठक, महत्तर, बलदर्शक, श्रावणिक, कालपाशिक, दण्डपाशिक, घातक आदि जिनका विवरण अधोदत्त है—
✊धर्माधिकारी
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न्याय—आसन पर बैठने वाले व्यक्ति को धर्मासनिक, धर्मस्थल, धर्माधिकारी आदि पदों से अभिहित किया जाता था।
अर्थशास्त्र में कण्टकशोधन—न्यायालयों के न्यायाधीशों को प्रदेष्टा, मानसोल्लास में उन्हें धर्माधिकारी तथा मृच्दकटिक में आधिकरणिक कहा गया है!
धर्मशास्त्रों और राजनीतिपरक ग्रंथों में न्यायाधीशों के पद के लिए ‘धर्मवेत्ता’ शब्द प्रयुक्त करते हुए कहा गया है कि धर्माध्यक्ष या धर्माधिकारी, कुलीन, शीलवान्, गुणसंपन्न सत्यवादी, धर्मपरायण, चतुर, प्रज्ञासंपन्न और दक्ष होना चाहिए।
✊प्राड्विवाक
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राजा को धर्मनिर्णय में सहायता देने के लिए जिस न्यायाधीश अथवा मंत्री की नियुक्ति का उल्लेख मिलता है, उसे प्राड्विवाक नाम दिया गया है।
न्यायाधीश विवादियों से प्रश्न करने के कारण ‘प्राड्’ तथा विवेक के अनुसार निर्णय करने के कारण ‘विवाक’ कहलाता था। दोनों का सम्मिलित रूप होने के कारण इस अधिकारी को प्राड्विवाक कहते हैं!
ये प्रथम भाग है द्रितीय भाग शिघ्र…..
